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Showing posts from April, 2008

आशा का दीपक / रामधारी सिंह "दिनकर"

वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नही है
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नही है
चिन्गारी बन गयी लहू की बून्द गिरी जो पग से
चमक रहे पीछे मुड देखो चरण-चिनह जगमग से
बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नही है
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नही है ।

Cited From:http://hi.literature.wikia.com/wiki, Dated २२-०४-2008

कवि आज सुना वह गान रे/अटल बिहारी वाजपेयी

कवि आज सुना वह गान रे,
जिससे खुल जाएँ अलस पलक।
नस – नस में जीवन झंकृत हो,
हो अंग – अंग में जोश झलक।

ये - बंधन चिरबंधन
टूटें – फूटें प्रासाद गगनचुम्बी
हम मिलकर हर्ष मना डालें,
हूकें उर की मिट जायँ सभी।

यह भूख – भूख सत्यानाशी
बुझ जाय उदर की जीवन में।
हम वर्षों से रोते आए
अब परिवर्तन हो जीवन में।

क्रंदन – क्रंदन चीत्कार और,
हाहाकारों से चिर परिचय।
कुछ क्षण को दूर चला जाए,
यह वर्षों से दुख का संचय।

हम ऊब चुके इस जीवन से,
अब तो विस्फोट मचा देंगे।
हम धू - धू जलते अंगारे हैं,
अब तो कुछ कर दिखला देंगे।

अरे ! हमारी ही हड्डी पर,
इन दुष्टों ने महल रचाए।
हमें निरंतर चूस – चूस कर,
झूम – झूम कर कोष बढ़ाए।

रोटी – रोटी के टुकड़े को,
बिलख–बिलखकर लाल मरे हैं।
इन – मतवाले उन्मत्तों ने,
लूट – लूट कर गेह भरे हैं।

पानी फेरा मर्यादा पर,
मान और अभिमान लुटाया।
इस जीवन में कैसे आए,
आने पर भी क्या पाया ?

क्रंदन – क्रंदन चीत्कार और,
हाहाकारों से चिर परिचय।
कुछ क्षण को दूर चला जाए,
यह वर्षों से दुख का संचय।

हम ऊब चुके इस जीवन से,
अब तो विस्फोट मचा देंगे।
हम धू - धू जलते अंगारे हैं,
अब तो कुछ कर दिखला देंगे।

रोना, भूखों मरना, ठोकर खाना,
क्या यही हमारा जी…

लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी / इक़बाल

लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी जिन्दगी शम्मा की सुरत हो ख़ुदाया मेरी
दूर दुनिया का मेरे दम अँधेरा हो जाए हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाये
हो मेरे दम से यूँ ही मेरे वतन की जीन्नत जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत
jindagii हो मेरी परवाने की सुरत या रब इलाम की शम्मा से हो मुझको मोहब्बत या रब
हो मेरा काम ग़रीबों की हिमायत करना दर्द-मंदों से ज़ैइफ़ों से मोहब्बत करना
mere अल्लाह बुराई से बचाना मुझको
नेक जो राह हो उस राह पे चलाना मुझको॥
Cited From: http://hi.literature.wikia.com/wiki/,Dated:१६-०४-२००८

22 Vows Dr.Ambedkar

Dr.B.R.Ambedkar prescribed 22 vows to his followers during the historic religious conversion to Buddhism on 15 October 1956 at Deeksha Bhoomi, Nagpur in India. The conversion to Buddhism by 800,000 people was historic because it was the largest religious conversion, the world has ever witnessed. He prescribed these oaths so that there may be complete severance of bond with Hinduism. These 22 vows struck a blow at the roots of Hindu beliefs and practices. These vows could serve as a bulwark to protect Buddhism from confusion and contradictions. These vows could liberate converts from superstitions, wasteful and meaningless rituals, which have led to pauperisation of masses and enrichment of upper castes of Hindus.

The famous 22 vows are:
I shall have no faith in Brahma, Vishnu and Mahesh nor shall I worship them.
I shall have no faith in Rama and Krishna who are believed to be incarnation of God nor shall I worship them.
I shall have no faith in ‘Gauri’, Ganapati and other gods and goddess…

अज आखां वारिस शाह नू - अमृता प्रीतम

अज आखां वारिस शाह नू कितों कबरां विचो बोल !
ते अज किताब -ऐ -इश्क दा कोई अगला वर्का फोल !

इक रोई सी धी पंजाब दी तू लिख -लिख मारे वेन
अज लखा धीयाँ रोंदिया तैनू वारिस शाह नू कहन

उठ दर्मंदिया दिया दर्दीआ उठ तक अपना पंजाब !
अज बेले लास्सन विछियां ते लहू दी भरी चेनाब !

किसे ने पंजा पानीय विच दीत्ती ज़हिर रला !
ते उन्ह्ना पनिया ने धरत उन दित्ता पानी ला !


जित्थे वजदी फूक प्यार दी वे ओह वन्झ्ली गई गाछ
रांझे दे सब वीर अज भूल गए उसदी जाच

धरती ते लहू वसिया , क़ब्रण पयियाँ चोण
प्रीत दियां शाहज़ादीआन् अज विच म्जारान्न रोण

अज सब ‘कैदों ’ बन गए , हुस्न इश्क दे चोर
अज किथों ल्यायिये लब्भ के वारिस शाह इक होर

aaj आखां वारिस शाह नून कित्तों कबरां विचो बोल !
ते अज किताब -ऐ -इश्क दा कोई अगला वर्का फोल !

Cited From:http://www.folkpunjab.com/amrita-pritam/aj-akhan-waris-shah-noon/
Date:11-4-2008

बदला न अपने आप को जो थे वही रहे / निदा फ़ाज़ली

बदला न अपने आप को जो थे वही रहे
मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे
दुनिया न जीत पाओ तो हारो न ख़ुद को तुम
थोड़ी बहुत तो ज़हन में नाराज़गी रहे
अपनी तरह सभी को किसी की तलाश थी
हम जिसके भी क़रीब रहे दूर ही रहे
गुज़रो जो बाग़ से तो दुआ माँगते चलो
जिसमें खिले हैं फूल वो डाली हरी रहे

Cited From;"http://hi.literature.wikia.com/wiki Dated:१७-०४-2008