Skip to main content

Posts

Showing posts from 2008

न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता / ग़ालिब

न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता
हुआ जब ग़म से यूँ बेहिस तो ग़म क्या सर के कटने का
न होता गर जुदा तन से तो ज़ाँनों पर धरा होता
हुई मुद्दत के "ग़ालिब" मर गया पर याद आता है
वो हर एक बात पे कहना के यूँ होता तो क्या होता
Cited from:http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title,dated १९-१२-2008

ग़ैर क्या जानिये क्यों मुझको बुरा कहते हैं / फ़िराक़ गोरखपुरी

गैर क्या जानिये क्यों मुझको बुरा कहते हैं
आप कहते हैं जो ऐसा तो बज़ा कहते हैं

वाकई तेरे इस अन्दाज को क्या कहते हैं
ना वफ़ा कहते हैं जिस को ना ज़फ़ा कहते हैं

हो जिन्हे शक, वो करें और खुदाओं की तलाश
हम तो इन्सान को दुनिया का खुदा कहते हैं

तेरी सूरत नजर आई तेरी सूरत से अलग
हुस्न को अहल-ए-नजर हुस्न नुमां कहते हैं

शिकवा-ए-हिज़्र करें भी तो करें किस दिल से
हम खुद अपने को भी अपने से जुदा कहते हैं

तेरी रूदाद-ए-सितम का है बयान नामुमकिन
फायदा क्या है मगर यूं जो जरा कहते हैं

लोग जो कुछ भी कहें तेरी सितमकोशी को
हम तो इन बातों अच्छा ना बुरा कहते हैं

औरों का तजुरबा जो कुछ हो मगर हम तो फ़िराक
तल्खी-ए-ज़ीस्त को जीने का मजा कहते हैं
Cited from: http://hi.literature.wikia.com/wiki
Dated:१५-१०-2008

साँस लेते हुए भी डरता हूँ / अकबर इलाहाबादी

साँस लेते हुए भी डरता हूँ
ये न समझें कि आह करता हूँ
बहर-ए-हस्ती में हूँ मिसाल-ए-हुबाब
मिट ही जाता हूँ जब उभरता हूँ
इतनी आज़ादी भी ग़नीमत है
साँस लेता हूँ बात करता हूँ
शेख़ साहब खुदा से डरते हो
मैं तो अंग्रेज़ों ही से डरता हूँ
आप क्या पूछते हैं मेरा मिज़ाज
शुक्र अल्लाह का है मरता हूँ
ये बड़ा ऐब मुझ में है 'अकबर'
दिल में जो आए कह गुज़रता हूँ

Cited From: http://hi.literature.wikia.com/wiki,dated;०६-०८-2008

जब तेरी समन्दर आँखों में / फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ये धूप किनारा शाम ढले
मिलते हैं दोंनो वक्त जहाँ
जो रात न दिन, जो आज न कल
पल भर में अमर, पल भर में धुंआँ
इस धूप किनारे, पल दो पल
होठों की लपक, बाँहों की खनक
ये मेल हमारा झूठ न सच
क्यों रार करें, क्यों दोष धरें
किस कारण झूठी बात करें
जब तेरी समन्दर आँखों में
इस शाम का सूरज डूबेगा
सुख सोयेंगे घर-दर वाले
और राही अपनी राह लेगा
Cited from:http://hi.literature.wikia.com/wiki,dated, 25-07-2008

आँख से दूर न हो / फ़राज़

आँख से दूर न हो दिल से उतर जायेगा
वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जायेगा
इतना मानूस न हो ख़िल्वत-ए-ग़म से अपनी
तू कभी ख़ुद को भी देखेगा तो डर जायेगा
तुम सर-ए-राह-ए-वफ़ा देखते रह जाओगे
और वो बाम-ए-रफ़ाक़त से उतर जायेगा
ज़िन्दगी तेरी अता है तो ये जानेवाला
तेरी बख़्शीश तेरी दहलीज़ पे धर जायेगा
डूबते डूबते कश्ती तो ओछाला दे दूँ
मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जायेगा
ज़ब्त लाज़िम है मगर दुख है क़यामत का "फ़राज़"
ज़ालिम अब के भी न रोयेगा तो मर जायेगा

Advertisement
"http://hi.literature.wikia.com/wiki, dated:०५-०७-2008

खुश हो ए दुनिया कि एक अच्छी खबर ले आये हैं / कुमार पाशी

खुश हो ए दुनिया कि एक अच्छी खबर ले आये हैं
सब ग़मों को हम मना कर अपने घर ले आये हैं

इस कदर महफूज़ गोशा इस ज़मीन पर अब कहां
हम उठा कर दश्त में दीवार-ओ-दर ले आये हैं

सनसनाते आसमान में उन पे क्या गुजरी न पूछ
आने वाले खून में तर बाल-ओ-पर ले आये हैं

देखता हूँ दुश्मनों का एक लश्कर हर तरफ
किस जगह मुझको यह मेरी हम-सफर ले आये हैं

मैं कि तारीकी का दुश्मन मैं अंधेरों का हरीफ़
इस लिए मुझको इधर अहल-ए-नज़र ले आये हैं

From: http://www.blogger.com/post-create.g?blogID=7630026879920558875, २५-०६-2008

दिल में न हो जुर्रत तो मुहब्बत नहीं मिलती / निदा फ़ाज़ली

दिल में न हो जुर्रत तो मुहब्बत नहीं मिलती
ख़ैरात में इतनी बड़ी दौलत नहीं मिलती

कुछ लोग यूँ ही शहर में हम से भी ख़फ़ा हैं
हर एक से अपनी भी तबीयत नहीं मिलती

देखा था जिसे मैं ने कोई और था शायद
वो कौन है जिस से तेरी सूरत नहीं मिलती

हँसते हुये चेहरों से है बाज़ार की ज़ीनत
रोने को यहाँ वैसे भी फ़ुर्सत नहीं मिलती

Cited from:http://hi.literature.wikia.com/wiki ,dated:07-06-2008

जाएँ तो जाएँ कहाँ / साहिर लुधियानवी

जाएँ तो जाएँ कहाँ
समझेगा कौन यहाँ दर्द भरे दिल की जुबाँ
जाएँ तो जाएँ कहाँ

मायूसियों का मजमा है जी में
क्या रह गया है इस ज़िन्दगी में
रुह में ग़म दिल में धुआँ
जाएँ तो जाएँ कहाँ

उनका भी ग़म है अपना भी ग़म है
अब दिल के बचने की उम्मीद कम है
एक किश्ती सौ तूफ़ाँ
जाएँ तो जाएँ कहाँ

Cited From:http://hi।literature.wikia.com/wiki/ Dated:०३-०५-2008

दिल को क्या हो गया ख़ुदा जाने / दाग़ देहलवी

दिल को क्या हो गया ख़ुदा जाने
क्यों है ऐसा उदास क्या जाने

कह दिया मैं ने हाल-ए-दिल
is को तुम जानो या ख़ुदा जाने

जानते जानते ही जानेगा
मुझ में क्या है वो अभी क्या जाने

तुम न पाओगे सादा दिल मुझ
साजो तग़ाफ़ुल को भी हया जाने

टूटे हुए पर की बात / ज्ञान प्रकाश विवेक

कभी दीवार कभी दर की बात करता था
वो अपने उज़ड़े हुए घर की बात करता था

मैं ज़िक्र जब कभी करता था आसमानों का
वो अपने टूटे हुए पर की बात करता था

न थी लकीर कोई उसके हाथ पर यारो
वो फिर भी अपने मुकद्दर की बात करता था

जो एक हिरनी को जंगल में कर गया घायल
हर इक शजर उसी नश्तर की बात करता था

बस एक अश्क था मेरी उदास आंखों में
जो मुझसे सात समंदर की बात करता था

Cited from:"http://hi.literature.wikia.com/wiki, Dated:19-05-2008

मेरी आंखों की पुतली में/जयशंकर प्रसाद

मेरी आँखों की पुतली में
तू बनकर प्रान समा जा रे!
जिसके कन-कन में स्पन्दन हो,
मन में मलयानिल चन्दन हो,
करुणा का नव-अभिनन्दन हो
वह जीवन गीत सुना जा रे!
खिंच जाये अधर पर वह रेखा
जिसमें अंकित हो मधु लेखा,
जिसको वह विश्व करे देखा,
वह स्मिति का चित्र बना जा रे !

Cited From:http://hi.literature.wikia.com/wiki/,Dated:०३-०५-2008

आशा का दीपक / रामधारी सिंह "दिनकर"

वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नही है
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नही है
चिन्गारी बन गयी लहू की बून्द गिरी जो पग से
चमक रहे पीछे मुड देखो चरण-चिनह जगमग से
बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नही है
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नही है ।

Cited From:http://hi.literature.wikia.com/wiki, Dated २२-०४-2008

कवि आज सुना वह गान रे/अटल बिहारी वाजपेयी

कवि आज सुना वह गान रे,
जिससे खुल जाएँ अलस पलक।
नस – नस में जीवन झंकृत हो,
हो अंग – अंग में जोश झलक।

ये - बंधन चिरबंधन
टूटें – फूटें प्रासाद गगनचुम्बी
हम मिलकर हर्ष मना डालें,
हूकें उर की मिट जायँ सभी।

यह भूख – भूख सत्यानाशी
बुझ जाय उदर की जीवन में।
हम वर्षों से रोते आए
अब परिवर्तन हो जीवन में।

क्रंदन – क्रंदन चीत्कार और,
हाहाकारों से चिर परिचय।
कुछ क्षण को दूर चला जाए,
यह वर्षों से दुख का संचय।

हम ऊब चुके इस जीवन से,
अब तो विस्फोट मचा देंगे।
हम धू - धू जलते अंगारे हैं,
अब तो कुछ कर दिखला देंगे।

अरे ! हमारी ही हड्डी पर,
इन दुष्टों ने महल रचाए।
हमें निरंतर चूस – चूस कर,
झूम – झूम कर कोष बढ़ाए।

रोटी – रोटी के टुकड़े को,
बिलख–बिलखकर लाल मरे हैं।
इन – मतवाले उन्मत्तों ने,
लूट – लूट कर गेह भरे हैं।

पानी फेरा मर्यादा पर,
मान और अभिमान लुटाया।
इस जीवन में कैसे आए,
आने पर भी क्या पाया ?

क्रंदन – क्रंदन चीत्कार और,
हाहाकारों से चिर परिचय।
कुछ क्षण को दूर चला जाए,
यह वर्षों से दुख का संचय।

हम ऊब चुके इस जीवन से,
अब तो विस्फोट मचा देंगे।
हम धू - धू जलते अंगारे हैं,
अब तो कुछ कर दिखला देंगे।

रोना, भूखों मरना, ठोकर खाना,
क्या यही हमारा जी…

लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी / इक़बाल

लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी जिन्दगी शम्मा की सुरत हो ख़ुदाया मेरी
दूर दुनिया का मेरे दम अँधेरा हो जाए हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाये
हो मेरे दम से यूँ ही मेरे वतन की जीन्नत जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत
jindagii हो मेरी परवाने की सुरत या रब इलाम की शम्मा से हो मुझको मोहब्बत या रब
हो मेरा काम ग़रीबों की हिमायत करना दर्द-मंदों से ज़ैइफ़ों से मोहब्बत करना
mere अल्लाह बुराई से बचाना मुझको
नेक जो राह हो उस राह पे चलाना मुझको॥
Cited From: http://hi.literature.wikia.com/wiki/,Dated:१६-०४-२००८

22 Vows Dr.Ambedkar

Dr.B.R.Ambedkar prescribed 22 vows to his followers during the historic religious conversion to Buddhism on 15 October 1956 at Deeksha Bhoomi, Nagpur in India. The conversion to Buddhism by 800,000 people was historic because it was the largest religious conversion, the world has ever witnessed. He prescribed these oaths so that there may be complete severance of bond with Hinduism. These 22 vows struck a blow at the roots of Hindu beliefs and practices. These vows could serve as a bulwark to protect Buddhism from confusion and contradictions. These vows could liberate converts from superstitions, wasteful and meaningless rituals, which have led to pauperisation of masses and enrichment of upper castes of Hindus.

The famous 22 vows are:
I shall have no faith in Brahma, Vishnu and Mahesh nor shall I worship them.
I shall have no faith in Rama and Krishna who are believed to be incarnation of God nor shall I worship them.
I shall have no faith in ‘Gauri’, Ganapati and other gods and goddess…

अज आखां वारिस शाह नू - अमृता प्रीतम

अज आखां वारिस शाह नू कितों कबरां विचो बोल !
ते अज किताब -ऐ -इश्क दा कोई अगला वर्का फोल !

इक रोई सी धी पंजाब दी तू लिख -लिख मारे वेन
अज लखा धीयाँ रोंदिया तैनू वारिस शाह नू कहन

उठ दर्मंदिया दिया दर्दीआ उठ तक अपना पंजाब !
अज बेले लास्सन विछियां ते लहू दी भरी चेनाब !

किसे ने पंजा पानीय विच दीत्ती ज़हिर रला !
ते उन्ह्ना पनिया ने धरत उन दित्ता पानी ला !


जित्थे वजदी फूक प्यार दी वे ओह वन्झ्ली गई गाछ
रांझे दे सब वीर अज भूल गए उसदी जाच

धरती ते लहू वसिया , क़ब्रण पयियाँ चोण
प्रीत दियां शाहज़ादीआन् अज विच म्जारान्न रोण

अज सब ‘कैदों ’ बन गए , हुस्न इश्क दे चोर
अज किथों ल्यायिये लब्भ के वारिस शाह इक होर

aaj आखां वारिस शाह नून कित्तों कबरां विचो बोल !
ते अज किताब -ऐ -इश्क दा कोई अगला वर्का फोल !

Cited From:http://www.folkpunjab.com/amrita-pritam/aj-akhan-waris-shah-noon/
Date:11-4-2008

बदला न अपने आप को जो थे वही रहे / निदा फ़ाज़ली

बदला न अपने आप को जो थे वही रहे
मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे
दुनिया न जीत पाओ तो हारो न ख़ुद को तुम
थोड़ी बहुत तो ज़हन में नाराज़गी रहे
अपनी तरह सभी को किसी की तलाश थी
हम जिसके भी क़रीब रहे दूर ही रहे
गुज़रो जो बाग़ से तो दुआ माँगते चलो
जिसमें खिले हैं फूल वो डाली हरी रहे

Cited From;"http://hi.literature.wikia.com/wiki Dated:१७-०४-2008

Stopping By Woods On A Snowy Evening

Whose woods these are I think I know.
His house is in the village though; He will not see me stopping here To watch his woods fill up with snow.
My little horse must think it queer To stop without a farmhouse near Between the woods and frozen lake The darkest evening of the year.
He gives his harness bells a shake To ask if there is some mistake. The only other sound's the sweep Of easy wind and downy flake.
The woods are lovely, dark and deep. But I have promises to keep, And miles to go before I sleep, And miles to go before I sleep.
-Robert Frost
Cited From: http://www.ketzle.com/frost/snowyeve.htm, Dated:०१-०४-2008

गजल :दुष्यंत कुमार

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
- दुष्यन्त कुमार

नियामक

"नियामक" शब्द रुडयार्ड किपलिंग की कविता "If" के हिन्दी अनुवाद मे मुझे मिला था। यह कविता मुझे काफी अच्छी और प्रेरणा स्त्रोत लगी। तब से यह शब्द मेरी जिन्दगी का अहम् और चुनिन्दा शब्द बन गया है। मूल कविता यहाँ पर दी गई है उम्मीद है आपको भी पसंद आएगी॥ इस सेक्शन मे आप चुनिंदा कवियों ,लेखकों ,विचारको के विचार इस मुख पृष्ट पर पाएंगे। मेरे इन ब्लोग्स का यह मेन पेज है ॥
-Desh Raj Sirswal

अगर : रुडयार्ड किपलिंग

Rudyard Kipling [IF]
If you can keep your head when all about you
Are losing theirs and blaming it on you,
If you can trust yourself when all men doubt you
But make allowance for their doubting too,
If you can wait and not be tired by waiting, Or being lied about, don't deal in lies,
Or being hated, don't give way to hating, And yet don't look too good, nor talk too wise:
If you can dream--and not make dreams your master,
If you can think--and not make thoughts your aim;
If you can meet with Triumph and Disaster
And treat those two impostors just the same;
If you can bear to hear the truth you've spoken
Twisted by knaves to make a trap for fools,
Or watch the things you gave your life to, broken, And stoop and build 'em up with worn-out tools:
If you can make one heap of all your winnings
And risk it all on one turn of pitch-and-toss,
And lose, and start again at your beginnings
And never breath a word about your loss; If you can force your heart and nerve and sinew
To serve your …