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कर चले हम फ़िदा / कैफ़ी आज़मी


कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो
साँस थमती गई, नब्ज़ जमती गई
फिर भी बढ़ते क़दम को न रुकने दिया
कट गए सर हमारे तो कुछ ग़म नहीं
सर हिमालय का हमने न झुकने दिया

मरते-मरते रहा बाँकपन साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

ज़िंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर
जान देने के रुत रोज़ आती नहीं
हस्न और इश्क दोनों को रुस्वा करे
वह जवानी जो खूँ में नहाती नहीं

आज धरती बनी है दुलहन साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

राह कुर्बानियों की न वीरान हो
तुम सजाते ही रहना नए काफ़िले
फतह का जश्न इस जश्न‍ के बाद है
ज़िंदगी मौत से मिल रही है गले

बांध लो अपने सर से कफ़न साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

खींच दो अपने खूँ से ज़मी पर लकीर
इस तरफ आने पाए न रावण कोई
तोड़ दो हाथ अगर हाथ उठने लगे
छू न पाए सीता का दामन कोई
राम भी तुम, तुम्हीं लक्ष्मण साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

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चुनिंदा शायरी -कंचन

तू रख होंसला वो मंजर भी आएगा।
प्यासे के पास चलकर समंदर भी आएगा।
थक हार कर न रुकना ऐ मंजिल के मुसाफ़िर,
मंजिल भी मिलेगी और मिलने का मज़ा भी आएगा।


जिंदगी की असली उडान अभी बाकी है।
जिंदगी के कई इम्तिहान अभी बाकी है।
अभी तो नापी है मुट्ठी भर  ज़मीन हमने ,
अभी तो सारा आसमान बाकी है।

आंधियों  में भी जैसे कुछ  चिराग़  जला करते हैं।
उतनी ही हिम्मत ऐ होंसला हम भी रखा करते हैं।
मंजिलों , अभी और दूर है हमारी मंजिल ,
चाँद सितारें  तो राहों में मिला करते हैं।

संग्रहकर्ता :
कंचन
बी ए 3.

दुनिया का बोझ- किरणदीप कौर

दुनिया का उठाकर बोझ,
खुद एक बोझ कहलाई है.
हारकर ख़ुशी अपनी,
जीत में दुःख ही लायी है.
होंठो पर लाकर हंसी,
आँखों की नमी छुपायी है.
पत्नी बनकर किसी का घर बसाया,
तकलीफें सहकर माँ कहलाई है.
अँधेरे में रहकर रौशनी बनी खुद
फिर भी क्यों,
ये दुनिया को नहीं दिख पाई है.
आसमान में ऊँचा है इसका वजूद,
समंदर से गहरी इसकी गहराई है.

भगत सिंह की पसंदीदा शायरी

दिल दे तो इस मिज़ाज़ का परवरदिगार दे
जो ग़म की घड़ी को भी खुशी से गुजार दे

सजाकर मैयते उम्मीद नाकामी के फूलों से
किसी बेदर्द ने रख दी मेरे टूटे हुए दिल में

छेड़ ना ऐ फरिश्ते तू जिक्रे गमें जानांना
क्यूँ याद दिलाते हो भूला हुआ अफ़साना
यह न थी हमारी किस्मत जो विसाले यार होताअगर और जीते रहते यही इन्तेज़ार होता तेरे वादे पर जिऐं हम तो यह जान छूट जानाकि खुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होतातेरी नाज़ुकी से जाना कि बंधा था अहदे फ़र्दाकभी तू न तोड़ सकता अगर इस्तेवार होटायह कहाँ की दोस्ती है (कि) बने हैं दोस्त नासेहकोई चारासाज़ होता कोई ग़म गुसार होताकहूं किससे मैं के क्या है शबे ग़म बुरी बला हैमुझे क्या बुरा था मरना, अगर एक बार होता(ग़ालिब)इशरते कत्ल गहे अहले तमन्ना मत पूछइदे-नज्जारा है शमशीर की उरियाँ होनाकी तेरे क़त्ल के बाद उसने ज़फा होनाकि उस ज़ुद पशेमाँ का पशेमां होनाfor more details go to:http://bhagatsinghstudy.blogspot.com/