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दुनिया का बोझ- किरणदीप कौर



दुनिया का उठाकर बोझ,

खुद एक बोझ कहलाई है.

हारकर ख़ुशी अपनी,

जीत में दुःख ही लायी है.

होंठो पर लाकर हंसी,

आँखों की नमी छुपायी है.

पत्नी बनकर किसी का घर बसाया,

तकलीफें सहकर माँ कहलाई है.

अँधेरे में रहकर रौशनी बनी खुद

फिर भी क्यों,

ये दुनिया को नहीं दिख पाई है.

आसमान में ऊँचा है इसका वजूद,

समंदर से गहरी इसकी गहराई है.

फूल से भी नाजुक तन है इसका,

पर्वतों से भी कठोर इसकी परछाई है.

पहेली है ये अजीब कितनी,

सुलझ कर भी नहीं सुलझ पाई है.

हाय रे ! कैसी किस्मत,

एक लड़की लेकर आई है.

किरणदीप कौर, बीए प्रथम वर्ष (648)
Citation:
http://www.scribd.com/doc/238603188/Sophia-Year-3-No-1-September-2014

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चुनिंदा शायरी -कंचन

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संग्रहकर्ता :
कंचन
बी ए 3.

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